नए शोध से पता चलता है कि जितना अधिक व्यक्ति मकड़ी या छिपकली से डरता है, उसकी अनुभूति में मकड़ी या छिपकली उसे उतना ही बड़ी लगती है। प्रायः ऐसी विकृत धारणाएं दैनिक जीवन के साथ हस्तक्षेप भी करने लगती हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग इंजेक्शन से डरते हैं, उन्हें दृढ़ विश्वास है कि सुई वास्तव में बड़ी दर्दनाक होती हैं और यह डर उन्हें आवश्यक स्वास्थ्य देखभाल से वंचित रख सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार अगर चिकित्सक यह बेहतर समझ लें कि कैसे एक भय की आशंका वस्तुओं के प्रति हमारे नजरिये एवं मान्यता को प्रभावित करती है, तो डर पर काबू पाने के और अधिक प्रभावी उपचार कर सकते हैं। एक छोटी सी हद तक स्वाभाविक डर जीवन का रक्षक है, किंतु हद से गुजरकर, विकराल रूप लेकर यही भक्षक बन जाता है।
यथार्थ से कहीं बहुत ज्यादा, कल्पित या अनुमानित भय को ‘फोबिया’ कहते हैं। जगत में करोड़ों मनुष्यों की जिंदगी इस तरह की भयभीत मानसिकता से ग्रस्त है। वे जीवन के सहज आनंद से वंचित रह जाते हैं। ऐसे लोगों को अक्सर रात में ‘नाइटमेयर्स’ अर्थात् भयावह सपने आते हैं।ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर और अध्ययन के प्रमुख लेखक माइकल वेसी कहते हैं, ‘जब आप भयभीत होते हैं, तब अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए आप उस वस्तु से बचते हैं जिससे आप आतंकित हैं। जब तक आप बचते रहते हैं, तब तक आप नहीं जान पाते कि हमारी आशंका निर्मूल है और वह वस्तु वास्तविकता से बड़ी लगती रहती है। और आप एक चक्रव्यूह में फंस जाते हैं।’
यह शोधपत्र जर्नल ऑफ एन्क्जायटी डिस्आर्डर नामक पत्रिका के हाल के एक अंक में प्रकाशित हुआ है।अध्ययन से पता चला है कि डर धारणा भी बदल देता है। डरावनी मकड़ी का आकार बड़ा लगता है और यह डर को बनाए रखने का कारक बनता है। डर न केवल डरावनी वस्तु की अनुभूति बदल देता है बल्कि व्यक्ति की किसी वस्तु की ओर दृष्टि को प्रभावित कर देता है। अगर आपने किसी डरावनी वस्तु की ओर एक नकारात्मक दृष्टिकोण बना लिया है तो आपको अपने डर पर काबू पाने में काफी मुश्किल हो सकती है। भविष्य में वह वस्तु क्रमशः और भी डरावनी प्रतीत होने लगेगी।
ओशो कहते हैं कि असत्य धारणा के भी असर सत्य होते हैं। जैसे, शाम के वक्त रस्सी को सांप समझकर कोई भागा हो, तो भागने में उसका ब्लड-प्रैसर बढ़ने से हार्ट-अटैक पड़ सकता है, या गड्ढे में गिरकर टांग टूट सकती है। माना कि सर्प झूठ है, किंतु हृदयाघात या फ्रैक्चर तो वास्तविक हो गए। परिणाम आने के पश्चात् मान्यता और भी अधिक मजबूत हो जाती है।
इस प्रकार के अंधविश्वासों से संस्कार-मुक्ति हेतु प्रति-सम्मोहित (डिहिप्नोटाइज) करना होगा। ‘फोबिया’ के मनोरोग से छुटकारा पाने का आसान तरीका है- तंद्रावस्था में धीरे-धीरे ‘डिसेंस्टाइजेशन’ करना। जैसे एक कांटे से दूसरा कांटा निकाल सकते हैं, वैसे ही निगेटिव सम्मोहन को, पॉजीटिव सम्मोहन से समाप्त कर सकते हैं। ओशोधारा का सम्मोहन-प्रज्ञा कार्यक्रम इस दिशा में सहयोगी साबित होता है।(प्रैसवार्ता)
भय के भूत से प्रभावित होती है हमारी अनुभूति
त्याग:नश्वर का त्याग शाश्वत की प्राप्ति
एक गांव में गया था। किसी ने कहा : धर्म त्याग है। त्याग बड़ी कठिन और कठोर साधना है।
मैं सुनाता था तो एक स्मरण हो आया। छोटा था- बहुत बचपना की बात होगी। कुछ लोगों के साथ नदी-तट पर वन-भोज को गया था। नदी तो छोटी थी, पर रेत बहुत थी और रेत में चमकीले रंगों-भरे पत्थर बहुत थे। मैं तो जैसे खजाना पा गया था। सांझ तक इतने पत्थर बीन लिये थे कि उन्हें साथ लाना असंभव था। चलते क्षण जब उन्हें छोड़ना पड़ा तो मेरी आंखें भीग गयी थीं। साथ के लोगों की उन पत्थरों के प्रति विरक्ति देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ था। उस दिन वे मुझे बड़े त्यागी लगे थे।
आज सोचता हूं, तो दिखता है कि पत्थरों को पत्थर जान लेने पर त्याग का कोई प्रश्न ही नहीं है।
अज्ञान भोग है। ज्ञान त्याग है।
त्याग क्रिया नहीं है। वह करना नहीं होता है। वह हो जाता है। वह ज्ञान का सहज परिणाम है। भोग भी यांत्रिक है। वह भी कोई करता नहीं है। वह अज्ञान की सहज परिणति है।
फिर, त्याग के कठिन और कठोर होने की बात ही व्यर्थ है। एक तो वह क्रिया ही नहीं है। क्रियाएं ही कठिन और कठोर हो सकती हैं। वह तो परिणाम है। फिर उससे जो छूटता मालूम होता है, वह निर्मूल्य और जो पाया जाता है, वह अमूल्य होता है।
वस्तुत: त्याग जैसी कोई वस्तु ही नहीं है, क्योंकि जो हम छोड़ते हैं, उससे बहुत को पा लेते हैं।
सच तो यह है कि हम केवल बंधनों को छोड़ते हैं और पाते हैं, मुक्ति। छोड़ते हैं, कौड़ियां और पाते हैं, हीरे। छोड़ते हैं, मृत्यु और पाते हैं, अमृत। छोड़ते हैं, अंधेरा और पा लेते हैं, प्रकाश-शाश्वत और अनंत।
इसलिए, त्याग कहाँ है? न-कुछ को छोड़कर सब कुछ को पा लेना त्याग नहीं है।(प्रैसवार्ता)
मृत्यु है ही नहीं
कल रात्रि कोई महायात्रा पर निकल गया है। उसके द्वार पर आज रुदन है।
ऐसे क्षणों में बचपन की एक स्मृति मन में दुहर जाती है। पहली बार मरघट जाना हुआ था। चिता जल गई थी और लोग छोटे-छोटे झुंड बनाकर बातें कर रहे थे। गांव के एक कवि ने कहा था 'मैं मृत्यु से नहीं डरता हूं। मृत्यु तो मित्र है।'
यह बात तब से अनेक रूपों में अनेक लोगों से सुनी है। जो ऐसा कहते हैं, उनकी आंखों में भी देखा है और पाया है कि भय से ही ऐसी अभय की बातें निकलती हैं।
मृत्यु के अच्छे नाम देने से ही कुछ परिवर्तन नहीं हो जाता है। वस्तुत: डर मृत्यु का नहीं है, डर अपरिचय का है। जो अज्ञात है, वह भय पैदा करता है। मृत्यु से परिचित होना जरूरी है। परिचय अभय में ले आता है। क्यों? क्योंकि परिचय से ज्ञात होता है कि 'जो है', उसकी मृत्यु नहीं है।
जिस व्यक्ति को हमने अपना 'मैं' जाना है, वही टूटता है, उसकी ही मृत्यु है। वह है नहीं, इसलिए टूट जाता है। वह केवल सांयोगिक है : कुछ तत्वों का जोड़ है, जोड़ खुलते ही बिखर जाता है। यही है मृत्यु। और इसलिए व्यक्तित्व के साथ स्वरूप के साथ एक जानना जब तक है, तब तक मृत्यु है।
व्यक्तित्व से गहरे उतरें, स्वरूप पर पहुंचे और अमृत उपलब्ध हो जाता है।
इस यात्रा का- व्यक्तित्व से स्वरूप तक की यात्रा का मार्ग धर्म है।
समाधि में, मृत्यु से परिचय हो जाता है।
सूरज उगते ही जैसे अंधेरा 'न' हो जाता है, वैसे ही समाधि उपलब्ध होते ही मृत्यु 'न' हो जाती है।
मृत्यु न तो शत्रु है, न मित्र है। मृत्यु है ही नहीं। न उससे भय करना है, न उससे अभय होना है। केवल उसे जानना है। उसका अज्ञान भय है, उसका ज्ञान अभय है।(प्रैसवार्ता)
सत्य को शब्द देना संभव नहीं
एक दिन मैं मंदिर गया था। पूजा हो रही थी। मूर्तियों के सामने सिर झुकाए जा रहे थे। एक वृद्ध साथ थे, बोले, 'धर्म में लोगों को अब श्रद्धा नहीं रही। मंदिर में भी कम ही लोग दिखाई पड़ते हैं।'
मैंने कहा, 'मंदिर में धर्म कहाँ है?'
मनुष्य भी कैसा आत्मवंचक है : अपने ही हाथों बनाई मूर्तियों को भगवान समझ स्वयं को धोखा दे लेता है!
मनुष्य के हाथों और मनुष्य के मन से जो भी रचित है, वह धर्म नहीं है। मंदिरों में बैठी मूर्तियां भगवान की नहीं, मनुष्य की ही हैं। शास्त्रों में लिखा हुआ मनुष्य की अभिलाषाओं और विचारणाओं का ही प्रतिफलन है- सत्य का अंतर्दर्शन नहीं। सत्य को तो शब्द देना संभव नहीं है।
सत्य की कोई मूर्ति संभव नहीं हैं; क्योंकि वह असीम है, अनन्त और अमूर्त है। न उसका कोई रूप है, न धारणा, न नाम। आकार देते ही वह अनुपस्थित हो जाता है।
उसे पाने के लिए सब मूर्तियां और सब मूर्त धारणाएं छोड़ देनी पड़ती हैं। स्व-निर्मित कल्पनाओं के सारे जाल तोड़ देने पड़ते हैं। वह असृष्ट तब प्रकट होता है, जब मनुष्य की चेतना उसकी मन:सृष्ट कारा से मुक्त हो जाती है।
वस्तुत: उसे पाने को मंदिर बनाने नहीं, विसर्जित करने होते हैं। मूर्तियां गढ़नी नहीं, विलीन करनी होती हैं। आकार के आग्रह खोने पड़ते हैं, ताकि निराकार का आगमन हो सके। चित्त से मूर्त के हटते ही वह अमूर्त प्रकट हो जाता है। वह तो था ही, केवल मूर्तियों और मूर्त में दब गया था। जैसे किसी कक्ष में सामान भर देने से रिक्त स्थान दब जाता है। सामान हटाओ और वह जहाँ था, वहीं है। ऐसा ही है,सत्य। मन को खाली करो वह है।(प्रैसवार्ता)
अभय-चेतना ही ईश्वरानुभूति
सुबह एक उपदेश सुना है। अनायास ही सुनने में आया है। एक साधु बोलते थे। मैं उस राह से निकलता तो सुन पड़ा। वे बोल रहे थे कि धार्मिक होने का मार्ग ईश्वर-भीरु होना है। जो ईश्वर से डरता है, वही धार्मिक है। भय ही उस पर प्रेम लाता है। 'भय बिनु होय न प्रीति।' प्रेम भय के अभाव में असंभव है।
साधारणतया, जिन्हें धार्मिक कहा जाता है, वे शायद भय के कारण ही होते हैं। जिन्हें नैतिक कहा जता है, उनके आधार में भी भय होता है।
कांट ने कहा है, 'ईश्वर न हो तो भी उसका मानना आवश्यक है।' यह भी शायद इसलिए है कि उसका भय लोगों को शुभ बनाता है।
मैं इन बातों को सुनता हूँ, तो हँसें बिना नहीं रहा जाता है। इतनी भ्रांत और असत्य शायद और कोई बात नहीं हो सकती है।
धर्म का भय से कोई संबंध नहीं है। धर्म तो अभय से उत्पन्न होता है।
प्रेम भी भय के साथ असंभव है। भय प्रेम कैसे पैदा कर सकता है? उससे तो केवल प्रेम का अभिनय ही पैदा हो सकता है। ओर अभिनय के पीछे अप्रेम के अतिरिक्त और क्या होगा? प्रेम का भय से पैदा होना एक असंभावना है।
वह धार्मिकता और नैतिकता जो भय पर आधारित होती हैं, सत्य नहीं मिथ्या है। वह आरोपण है, आत्मशक्ति का आरोहण नहीं। धर्म या प्रेम आरोपित नहीं किया जाता है। उसे तो जगाना होता है।
सत्य भय पर नहीं खड़ा होता है। वह सत्य के लिए आधार नहीं विरोध ही है। उसकी आधारशिला तो असंभव है।
धर्म और प्रेम के फूल अभय की भूमि में ही लगते हैं और भय में जो लगा लिए जाते हैं, वे फूल नहीं कागज के धोखे हैं।
ईश्वरानुभूति अभय में ही उपलब्ध होती है। या कि ठीक हो, यदि कहें कि अभय-चेतना ही ईश्वरानुभूति है। जिस क्षण समस्त भय-ग्रंथियां चित्त से विसर्जित हो जाती हैं, उस क्षण जो होता है, वही सत्य है।(प्रैसवार्ता)
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