आज का मनुष्य किस हद तक क्रूर बन गया है कि उसकी क्रूरता देखकर राक्षस भी शर्मा जायेगा। आज आदमी बिल्ली और कुतों का मांस खाने लगा है, गधों का खून पीने लगा है। होटलों में मनुष्य का मांस परोसा जाता है। भू्रण-शिशुओं की हत्या करके उनके मांस की दावतें दी जाती हैं। आज अण्डे और मछली खाने की बात पुरानी हो गई। अब तो मानव कीट भोजी और नरभक्षी बन गया है। कीड़े, टिड्डे, छिपकलियों, झींगुरों, चींटियों के व्यंजन बनाकर खाने लगा है। चीन की एक महिला चिकित्सक ने एक वर्ष में 100 भू्रणों का मांस खाया। भारतवर्ष में भी 57 लाख से एक करोड़ भू्रण हत्याएं प्रतिवर्ष हो रही हैं। मनुष्य की व्ूरता, नृशंसता की बातें सुनकर तो हृदय दहल उठता है। ऐसा लगता है, करुणा, दया नाम का तत्व तो मानव हृदय से लुप्त ही हो गया है और मनुष्य की मनुष्यता मर चुकी है। केवल मांसाहारी लोग ही इस क्रूरता में शामिल नहीं है, परन्तु आप अपने को सज्जन, दयालु, धार्मिक और जैनी कहलाने वाले भी जाने-अजाने ऐसी क्रूर हिंसा में भागीदार बन रहे हैं। कुछ वर्ष पहले बड़ौदा (गुजरात) से प्रकाशित (लोकसता-जनसता) 2 अप्रैल 1994 के अंक में एक समाचार पढ़ा था कि चण्डीगढ़ का पी.जी.आई. सेन्टर हर वर्ष वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए करीब 200 बंदर, 100 कुने, 2,000 खरगोश, 500 गिनीपिग्ज तथा 10,000 चूहे मारता है। यह तो एक शहर की खबर है। इस प्रकार के सैकड़ों सेंटर हैं, इससे बड़े-बड़े अनेक सेंटर हैं। उनमें क्या होता होगा? हजारों, लाखों प्राणी रोज मौत के घाट उतरते होंगे। कहते हैं मियामी हवाई अड्डों से 200 जहाज हर हल्ता पशुओं से भरक अमेरिका जाते हैं और सीमाी बात है अमेरिका उन पशुओं को कोई पालने के लिए थोड़ा ही मंगाता है, वह उन सबके मांस, हड्डी, खून, बाल एक-एक अंग का उपयोग करता है। आज आपके मौज-शौक के लिए किस प्रकार छोटे-छोटे प्राणियों पर अत्यंत व्ूरता के साथ प्रहार किये जाते हैं। मौज, शौक, पफैशन के लिए संसार में आज कितनी व्ूरता हो रही है, इसका भी बड़ा दर्दनाक चित्र है, हमारे सामने।
चिडिय़ाघरों में आप लोग बिल्ली जैसा एक छोटा सा मासूम जानवर देखते होंगे-बिज्जू। सेंट बनाने के लिए इसे पकड़कर बैंतों से सूता जाता है, ताकि पीड़ा से उद्विग्न होकर उसकी यौन ग्रंथि स्रावित हो, फिर तेज धारदार चाकू से उसका वह स्राव खरोंच-खरोंचकर सुगंमिात सेंट बनाकर सुंदर बोतलों में पैकिंग हुआ आपके सामने आता है। सेंट लगाते समय यदि आप एक क्षण भर कल्पना करो-बिज्जो पर बैंतों की निर्मम बरसा हो रही है, वह तड़प रहा है, और फिर तेज मारदार चाकू से खरोंच-खरोंच कर उसका स्राव एकत्रा किया जा रहा है तो आपका हृदय कांप उठेगा, शायद सेंट देखते ही आपको घृणा होगी, आप उसे छूना भी नहीं चाहेंगे? कश्मीर में वराकुल नाम की भेंड़े होती हैं, जिनकी चमड़ी पर रोयें बहुत ही मुलायम, आकर्षक और सघन होते हैं। प्रछति ने उसे सुंदरता और मुलायम रोयें देकर कितना बड़ा क्रूर मजाक किया है उसके साथ। लोभी, सौंदर्य प्रेमी मानव उसकी मुलायम चमड़ी और रायेंदार मुलायम बालों के लिए उसके नवजात शिशुओं की खाल खींच लेते हैं, जिससे पफर के कोट और टोपी बनती है, अपने शौक के लिए, दूसरे की चमड़ी उमोड़ लेने वाला मानव, क्या मानव है? क्या कहीं है उसमें दया व करुणा का अंश? एक नहीं, सैकड़ों ऐसे प्राणी हैं, जो आज मनुष्य की बर्बरता के शिकार हो रहे हैं। गिनीपिग, बीबर, बिज्जू, लोरिस, सील मछली, कराकुल, सूअर, कछुआ, सांप आदि अनेकानेक प्राणियों को मनुष्य सिपर्फ अपने शौक के लिए मारता है, जीवित ही उनकी खाल उतारता है, उनका खून खींचता है, सिर्फ इसलिए कि इनसे उसके मौज-शौक पूरे होते हैं? सांपों की खाल से नरम पर्स, सील मछली के बच्चों की खाल से मुलायम कोट और कराकुल भेड़ के शिशुओं की खाल से बनी टोपियां, इनको देखते ही क्या आपका हृदय स्पन्दित नहीं होता? बताते हैं-कनाडा और नार्वे आदि में सील मछली बहुतायात में पायी जाती है। लोहे की तीखी सलाई सील शिशु के सिर में घोंप दी जाती है ताकि इसकी खाल अखण्ड निकल आए। जब सील शिशु उस तीखी सलाई से लहूलुहान होकर चीखता-तड़पता है, तब मादा सील अपने बच्चे को यों खून में सने-तड़पते देखकर इतनी भयानक ढंग से दहाड़ती है कि मानो समुद्र तक दहाडऩे लगता है, इस दृश्य को देखकर सूरज भी कांप उठता है। 9-10 सील शिशुओं की खाल से एक कोट बनता है। इसी प्रकार कराकुल भेड़ जब गर्भवती होती है, तब बैंतों से पीट-पीटकर उसका भू्रण गिराया जाता है और उस नवजात भू्रण को चीरकर मुलायम रायेंदार चमड़ी प्राप्त की जाती है। क्या इस दृश्य को देखकर आपकी आंखें सूखी रह जायेंगी? इस प्रकार अत्यंत व्ूर, निर्मम और बर्बर तरीकों से मनुष्य अपना शौक पूरा करता है। संसार में आज व्ूरता और बर्बरता चरम सीमा पर पहुंच गई है। आप जानते हैं, पाप और हिंसा जब अपनी चरम सीमा पर पहुंचती है तो उसका एक ही परिणाम होता है-महाविनाश! ऐसा लगता है, आज यदि मनुष्य इस व्ूरता और बर्बरता से पीछे नहीं हटेगा तो कहीं वह अपने ही हाथों अपनी मानवजाति का सर्वनाश न कर बैठे? इतिहास साक्षी है क्रूरता का अंतिम परिणाम नाश ही होता है। -उपाध्याय पुष्कर मुनि, प्रैसवार्ता
