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मंगलपाठ-श्रवण: क्यों, कैसे, क्या लाभ ?

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Devendra Muni

मंगलमय और अमंगलमय शब्दों के श्रवण का प्रभाव -
आप लोगों ने अनुभव किया होगा, सुना और देखा होगा कि किसी के मुँह से खुशखबरी या हर्ष के शब्द सुनकर मनुष्य प्रसन्नता का अनुभव करता है, बल्कि राजा, श्रेष्ठी या किसी पदाधिकारी को कोई बधाई या मांगल्यसूचक शब्द बोलता है, तो वे उसे सुनकर खुशी से झूम उठते हैं और बधाई देने या खुशी के शब्द सुनाने वाले को पारितोषिक या इनाम देते हैं। कोई-कोई राजा - महाराजा तो तीर्थंकर, केवली, अवधिज्ञानी अथवा ज्ञानी साधु या साध्वी के अपने गाँव या नगर में पधारने की खबर सुनाने वाले को बहुत बड़ा इनाम देते थे। किन्तु इसके विपरीत अमंगलकारक शब्द सुनते ही या तो वे उदास या हताश हो जाते या सुनाने वाले से झगड़ा कर बैठते, यहाँ तक कि मारपीट पर उतारू हो जाते थे। विवाह के समय दूल्हा बारात लेकर जा रहा हो, उस समय कोई मूर्ख ‘‘राम-राम सत्य है’’ या अन्य कोई अपशब्द कहे तो अमंगलसूचक समझकर उसको मारपीट कर भगा दिया जाता है। मंगलमय शब्दों और अमंगलमय शब्दों के श्रवण का अनुकूल और प्रतिकूल प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता।
मंगलपाठ या मांगलिक श्रवण क्यों? अमांगलिक क्यों नहीं?
         ठीक इसी प्रकार विदेश या परदेश यात्रा से पूर्व, किसी सत्कार्य के प्रारम्भ करते समय, प्रवचन प्रारम्भ करने से पूर्व अथवा किसी को किसी सत्कार्य में सफलता प्राप्त करने से पूर्व मंगलाचरण, मंगलमय महापुरुषों का नाम स्मरण, अथवा मंगलपाठ- श्रवण से अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे किसी भी सत्कार्य के प्रारम्भ करते समय, या मांगलिक कार्य या उत्सव मनाते समय कोई अमंगलिक शब्द कह देता है या उसके कार्य में विध्न डालने के लिए अपशब्द कह देता है तो उसे अच्छा नहीं समझा जाता। यही कारण है कि जैन-जैनेतर प्रायः सभी धर्मसंघों में मंगलपाठ-श्रवण करने की परम्परा है। जो व्यक्ति मंगलपाठ-श्रवण के रहस्य और प्रयोजन को भलीभाँति समझता है, उसे मंगलपाठ-श्रवण से न केवल कानों को आनन्द मिलता है, अपितु उसका तन-मन-हृदय पुलकित हो उठता है। वस्तुतः मंगलपाठ-श्रवण भी धर्मश्रवण की तरह अपूर्व फलदायक है।
              किन्तु सबसे पहले तो यही समझना है कि मंगल क्या है, उसका स्वरूप और तात्पर्य क्या है? उसके कितने प्रकार या पहलू हैं? क्योंकि मंगल को समझने के बाद मंगलपाठ-श्रवण करने का रहस्य समझ मंे आ जायेगा।
सांसारिक गृहस्थ द्रव्यमंगल को विशेष महत्त्व देते हैं
                         सांसारिक गृहस्थ लोग प्रायः द्रव्यमंगल को विशेष महत्त्व देते हैं। किसी के विदा होते समय या विवाह आदि प्रसंगों पर अक्षत (धवल) और कुंकुम का तिलक किया जाता है, अथवा श्रीफल उसके हाथ में दिया जाता है, ताकि उसके कार्य में सफलता मिले, अथवा गुड़ से उसका मुँह मीठा किया जाता है, ताकि मधुरता से उसका कार्य सम्पन्न हो, या दही खिलाकर उसे विदा किया जाता है, ताकि दही की तरह वह निर्धारित कार्य में स्थिर हो जाये, कार्य को सुचारु रूप से सम्पन्न कर सके। इसी प्रकार सत्कार्य के लिए विदा होते समय उसकी माता, बहन या पत्नी अथवा पिता, भाई या कोई बुजुर्ग व्यक्ति उसे आशीर्वाद देकर या आशीर्वचन कहा करते हैं। यह है- द्रव्यमंगल की लौकिक परम्परा! द्रव्यमंगल की अपेक्षा आध्यात्मिक जगत् में भावमंगल को विशेष महत्त्व दिया जाता है। द्रव्यमंगल का उपचार करने पर भी कभी-कभी अमंगल होता देखा जाता है। अतः आध्यात्मिक मनीषियों ने भावमंगल को ही विशेष महत्त्व दिया है।
धर्मरूप भावमंगल का महत्त्व और स्वरूप
     भावमंगल क्या है? इसका स्वरूप और कार्य क्या है? इसे समझना आवश्यक है, तभी मंगलपाठ-श्रवण का रहस्य समझ में आ जायेगा।
दशवैकालिकसूत्र के पहले अध्याय की पहली गाथा इस तथ्य का भलीभाँति उद्घाटन करती है-
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो
देवा वि तं नमंसंति, जस्स धम्मे सया मणो।।
धर्म उत्कृष्ट मंगल (भावमंगल) है; और वह है- अहिंसा-संयम-तपरूप। जिस व्यक्ति के अन्तःकरण में धर्म (मंगल) रमा रहता है, उसे देव, (दानव, मानव, राजा चक्रवर्ती) आदि भी नमस्कार करते हैं। उसके आगे नतमस्तक हो जाते हैं।
धर्म भावमंगल है
इसके अतिरिक्त जो भी व्यक्ति अहिंसा, संयम और तपरूप उत्कृष्ट धर्ममंगल पर चले हैं, चल रहे हैं, यानी जिन्होंने धर्ममंगल को आत्मसात् कर लिया है, जीवन में रमा लिया है, धर्ममंगल को जीवन का स्वाभाविक अंग बना लिया है ऐसे मंगलमय महान् व्यक्ति या वीतरागता प्राप्त महापुरुष या वीतराग के पथ पर अहर्निश चलने वाले साधु-साध्वीगण (आचार्य, उपाध्याय, साधु आदि) मंगलरूप है, उनका स्मरण भी मंगल है। जैसा कि मंगलपाठ में कहा गया है-
‘‘अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं।
साहू मंगलं, केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगलं।।’’
अर्थात्- अरिहंत मंगल हैं, सिद्ध मंगल हैं साधु मंगल हैं और केवलज्ञानी (वीतरागसर्वज्ञ) द्वारा प्रज्ञप्त (आत्म) धर्म मंगल है।
मंगल शब्द के विविध अर्थ और फलितार्थ
ये चारों क्यों मंगल हैं? यह मंगल शब्द के व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ से स्पष्ट ज्ञात हो जाता है। मंगल शब्द का निर्वचन करते हुए आचार्य कहते हैं-
‘‘मां गालयति, भवादपनयतीति मंगलम्’ अथवा ममत्त्वं-अहंत्वं गलति येन तत् मंगलम्। पहले निर्वचन का अर्थ है- जो मुझे भव = संसार से दूर कर दे हटा दे, मेरा भवभ्रमण नष्ट कर दे, वह मंगल है। दूसरे निर्वचन का अर्थ है- जिससे ममत्व या अहंकार गल जाये-नष्ट हो जाये, वह मंगल है। अतः इसका फलितार्थ है, जो मेरे वासनामय (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि वासनामय बने हुए) स्वरूप को गाल दे- नष्ट कर दे, वह मंगल है।
विशुद्ध आत्मा ही वास्तव में महामंगल है, क्यों और कैसे?
                                  मंगल शब्द का यह निर्वचन अन्त में हो आत्मा की ही पूर्ण रूप से विशुद्धि करने की ओर इंगित करता है। अर्थात् मंगलपाठ में उक्त मंगल-प्रबोध मंगलपाठ के श्रोता की आत्मा को विशुद्ध बनाकर स्वयं मंगलमय बनने के लिए है। इसलिए कहना चाहिए- विशुद्ध आत्मा ही स्वयं मंगल है, महामंगल है। धर्मरूप महामंगल को पाकर, अथवा धर्ममंगल को जीवन में रमाकर अरिहंतों और सिद्धों ने महामंगल की प्राप्ति की है। अतः महामंगल रूप इन चारों का स्वरूप समझकर मंगलपाठ श्रवण करके तथा मंगलपाठ में उक्त चारों महामंगलों का स्मरण करके-स्वरूप समझकर आत्मा को विशुद्ध तथा तदरूप मंगलमय बनाना है।
अरिहन्तों और सिद्धों का महामंगलमय नाम-स्मरण करके उनका स्वरूप समझकर अन्त में तो आत्मा को अपने अरिहन्त स्वरूप तथा सिद्ध स्वरूप को प्रगट करना है, साधु भगवन्तों का मंगलमय नाम-स्मरण करके उनकी उपासना करके, उनसे आत्मा के मंगलस्वरूप को समझकर आत्मा में साधुत्व प्रगट करना है, तथा आत्म-धर्मरूप महामंगल को भलीभाँति समझकर अपने जीवन में प्रकट करना है। ऐसी स्थिति में मंगलपाठ-श्रवण का प्रयोजन तथा फलितार्थ यही निकलता है कि अरिहन्तादि-स्वरूप अपना विशुद्धात्मा ही मंगल है, आत्मा के निजी अनन्त गुणचतुष्टय का भण्डार ही महामंगल है।
                               मूल में तो मंगलपाठ-श्रवण का प्रयोजन यही है कि हमारी विशुद्ध आत्मा जो अनादिकाल से मोहनिद्रा में सोई हुई है, उसे जागृत करके उससे अनन्त चतुष्टय रूप विशुद्ध गुणों को प्रकट करके उसे ही महामंगल रूप बनाना है।
                    यही कारण है कि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्राचार्य ने योगशास्त्र के बारहवें प्रकाश के अन्तिम श्लोक में बताया है कि ‘‘हे आत्मन्! तू देवी-देवों को खुश करने की बात छोड़ दे, तथा अरिहन्त-सिद्ध वीतराग-परमात्माओं को भी खुश करने या उन्हें रिझाने की अपेक्षा तू अपनी आत्मा को खुश कर अपने मन-बुद्धि-चित्त-हृदय को प्रसन्न कर-शुद्ध और निर्मल बना।’’ दुःख, अज्ञान और दुर्गति में पड़े हुए अपने आत्म भगवान् को तू मंगलपाठ-श्रवण करके जागृत कर इन दोषों और अशुद्धियों से आत्मा को बाहर निकाल, अपार आत्मानन्द में स्नान कर। अपनी अनन्त शक्तियों को प्रकट शक्तियों को प्रकट करने के लिए पुरुषार्थ कर।
मंगल शब्द के अन्य निर्वचन
                इस दृष्टि से आचार्य हरिभद्र सूरि ने मंगल का निर्वचन किया है-
‘‘मंग्यतेऽधिगम्यते हितमनेनेति मंगलम्।’’ - जिससे हित की, आत्मकल्याण की प्राप्ति हो, वह मंगल है। मल्लधारी आचार्य हेमचन्द्र भी इसी तथ्य को दूसरे रूप में प्रगट करते हुए कहते हैं- ‘‘मह्यन्ते पूज्यन्तेऽनेनेति मंगलम्।’’ जिसके द्वारा आत्मा पूज्य = विश्ववन्द्य होता है, वह मंगल है।
                इस दृष्टि से जब हम मंगलपाठ में उक्त चार भावमंगलों पर दृष्टिपात करते हैं तो स्पष्ट समझ में आ जाता है, जिन महान् आत्माओं ने दोषों से रहित होकर सद्गुणों को अपने जीवन में अपनाया, अपनी आत्मा का हित या कल्याण साधा, वे भावमंगलरूप बन गये; साथ ही उसकी आत्मा परम विशुद्ध हो गई अथवा परम विशुद्धि के मार्ग पर कतिपय महान् आत्मा चले, अथवा उन मंगलमय बनने वालों के लिए जो केवलिप्ररूपित आत्मधर्म सम्बल बना, यानी सम्यक्-ज्ञान-दर्शन-चारित्र- तपरूप जो आत्मधर्म सहायक और मार्गदर्शक बना, उस मंगलमार्ग पर चलने से वे महान् आत्माएँ पूजनीय-वन्दनीय बनी, धर्म भी पूज्य बना।
यही कारण है कि मंगलपाठ के श्रवण और स्मरण द्वारा श्रोता का जीवन भी मंगलमय बन सकता है, बन जाता है। आचार्य सम्राट् श्री देवेन्द्र मुनि जी म. सा., प्रैसवार्ता

फैशन के नाम पर क्रूरता

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Pushkar Muniआज का मनुष्य किस हद तक क्रूर बन गया है कि उसकी क्रूरता देखकर राक्षस भी शर्मा जायेगा। आज आदमी बिल्ली और कुतों का मांस खाने लगा है, गधों का खून पीने लगा है। होटलों में मनुष्य का मांस परोसा जाता है। भू्रण-शिशुओं की हत्या करके उनके मांस की दावतें दी जाती हैं। आज अण्डे और मछली खाने की बात पुरानी हो गई। अब तो मानव कीट भोजी और नरभक्षी बन गया है। कीड़े, टिड्डे, छिपकलियों, झींगुरों, चींटियों के व्यंजन बनाकर खाने लगा है। चीन की एक महिला चिकित्सक ने एक वर्ष में 100 भू्रणों का मांस खाया। भारतवर्ष में भी 57 लाख से एक करोड़ भू्रण हत्याएं प्रतिवर्ष हो रही हैं। मनुष्य की व्ूरता, नृशंसता की बातें सुनकर तो हृदय दहल उठता है। ऐसा लगता है, करुणा, दया नाम का तत्व तो मानव हृदय से लुप्त ही हो गया है और मनुष्य की मनुष्यता मर चुकी है। केवल मांसाहारी लोग ही इस क्रूरता में शामिल नहीं है, परन्तु आप अपने को सज्जन, दयालु, धार्मिक और जैनी कहलाने वाले भी जाने-अजाने ऐसी क्रूर हिंसा में भागीदार बन रहे हैं। कुछ वर्ष पहले बड़ौदा (गुजरात) से प्रकाशित (लोकसता-जनसता) 2 अप्रैल 1994 के अंक में एक समाचार पढ़ा था कि चण्डीगढ़ का पी.जी.आई. सेन्टर हर वर्ष वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए करीब 200 बंदर, 100 कुने, 2,000 खरगोश, 500 गिनीपिग्ज तथा 10,000 चूहे मारता है। यह तो एक शहर की खबर है। इस प्रकार के सैकड़ों सेंटर हैं, इससे बड़े-बड़े अनेक सेंटर हैं। उनमें क्या होता होगा? हजारों, लाखों प्राणी रोज मौत के घाट उतरते होंगे। कहते हैं मियामी हवाई अड्डों से 200 जहाज हर हल्ता पशुओं से भरक अमेरिका जाते हैं और सीमाी बात है अमेरिका उन पशुओं को कोई पालने के लिए थोड़ा ही मंगाता है, वह उन सबके मांस, हड्डी, खून, बाल एक-एक अंग का उपयोग करता है। आज आपके मौज-शौक के लिए किस प्रकार छोटे-छोटे प्राणियों पर अत्यंत व्ूरता के साथ प्रहार किये जाते हैं। मौज, शौक, पफैशन के लिए संसार में आज कितनी व्ूरता हो रही है, इसका भी बड़ा दर्दनाक चित्र है, हमारे सामने।
चिडिय़ाघरों में आप लोग बिल्ली जैसा एक छोटा सा मासूम जानवर देखते होंगे-बिज्जू। सेंट बनाने के लिए इसे पकड़कर बैंतों से सूता जाता है, ताकि पीड़ा से उद्विग्न होकर उसकी यौन ग्रंथि स्रावित हो, फिर तेज धारदार चाकू से उसका वह स्राव खरोंच-खरोंचकर सुगंमिात सेंट बनाकर सुंदर बोतलों में पैकिंग हुआ आपके सामने आता है। सेंट लगाते समय यदि आप एक क्षण भर कल्पना करो-बिज्जो पर बैंतों की निर्मम बरसा हो रही है, वह तड़प रहा है, और फिर तेज मारदार चाकू से खरोंच-खरोंच कर उसका स्राव एकत्रा किया जा रहा है तो आपका हृदय कांप उठेगा, शायद सेंट देखते ही आपको घृणा होगी, आप उसे छूना भी नहीं चाहेंगे? कश्मीर में वराकुल नाम की भेंड़े होती हैं, जिनकी चमड़ी पर रोयें बहुत ही मुलायम, आकर्षक और सघन होते हैं। प्रछति ने उसे सुंदरता और मुलायम रोयें देकर कितना बड़ा क्रूर मजाक किया है उसके साथ। लोभी, सौंदर्य प्रेमी मानव उसकी मुलायम चमड़ी और रायेंदार मुलायम बालों के लिए उसके नवजात शिशुओं की खाल खींच लेते हैं, जिससे पफर के कोट और टोपी बनती है, अपने शौक के लिए, दूसरे की चमड़ी उमोड़ लेने वाला मानव, क्या मानव है? क्या कहीं है उसमें दया व करुणा का अंश? एक नहीं, सैकड़ों ऐसे प्राणी हैं, जो आज मनुष्य की बर्बरता के शिकार हो रहे हैं। गिनीपिग, बीबर, बिज्जू, लोरिस, सील मछली, कराकुल, सूअर, कछुआ, सांप आदि अनेकानेक प्राणियों को मनुष्य सिपर्फ अपने शौक के लिए मारता है, जीवित ही उनकी खाल उतारता है, उनका खून खींचता है, सिर्फ इसलिए कि इनसे उसके मौज-शौक पूरे होते हैं? सांपों की खाल से नरम पर्स, सील मछली के बच्चों की खाल से मुलायम कोट और कराकुल भेड़ के शिशुओं की खाल से बनी टोपियां, इनको देखते ही क्या आपका हृदय स्पन्दित नहीं होता? बताते हैं-कनाडा और नार्वे आदि में सील मछली बहुतायात में पायी जाती है। लोहे की तीखी सलाई सील शिशु के सिर में घोंप दी जाती है ताकि इसकी खाल अखण्ड निकल आए। जब सील शिशु उस तीखी सलाई से लहूलुहान होकर चीखता-तड़पता है, तब मादा सील अपने बच्चे को यों खून में सने-तड़पते देखकर इतनी भयानक ढंग से दहाड़ती है कि मानो समुद्र तक दहाडऩे लगता है, इस दृश्य को देखकर सूरज भी कांप उठता है। 9-10 सील शिशुओं की खाल से एक कोट बनता है। इसी प्रकार कराकुल भेड़ जब गर्भवती होती है, तब बैंतों से पीट-पीटकर उसका भू्रण गिराया जाता है और उस नवजात भू्रण को चीरकर मुलायम रायेंदार चमड़ी प्राप्त की जाती है। क्या इस दृश्य को देखकर आपकी आंखें सूखी रह जायेंगी? इस प्रकार अत्यंत व्ूर, निर्मम और बर्बर तरीकों से मनुष्य अपना शौक पूरा करता है। संसार में आज व्ूरता और बर्बरता चरम सीमा पर पहुंच गई है। आप जानते हैं, पाप और हिंसा जब अपनी चरम सीमा पर पहुंचती है तो उसका एक ही परिणाम होता है-महाविनाश! ऐसा लगता है, आज यदि मनुष्य इस व्ूरता और बर्बरता से पीछे नहीं हटेगा तो कहीं वह अपने ही हाथों अपनी मानवजाति का सर्वनाश न कर बैठे? इतिहास साक्षी है क्रूरता का अंतिम परिणाम नाश ही होता है। -उपाध्याय पुष्कर मुनि, प्रैसवार्ता

उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी के साहित्य में नारी जीवन और उसके आदर्श

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Indian Womanवाली माता के नन्दन उपाध्याय श्री पुष्करमुनि जी म.सा. साधना के शिखर पुरूष और ज्ञानी-ध्यानी संत थे। विभिन्न विषयों पर जीवन निर्माणकारी साहित्य रचकर उन्होनें अपने उपाध्याय पद को सचमुच सार्थक कर दिया था। उनके साहित्य के मुख्यतः दो स्रोत एवं तीन धाराएँ है। स्रोत के अन्तर्गत लिखित और प्रवचन साहित्य सम्मिलित किया जा सकता है। उनके साहित्य की तीन धाराएँ हैं- निबंध, कथा और काव्य। कथा साहित्य में ‘‘जैन कथाएं‘‘ शीर्षक से एक सौ ग्यारह भाग लिखकर उन्होने एक कीर्तिमान रच दिया। निबंध और कविता में भी उनके साहित्य का विशिष्ट स्थान है। उनका साहित्य बहुआयामी था। उसमें नारी जीवन और उसके आदर्शों पर इतनी सामग्री है कि पूरा एक शोध प्रबंध ही लिखा जा सकता है। इसलिये यहां हम  उनके चन्द संदर्भों के साथ कुछ आदर्शो की ही चर्चा कर पाएगें। उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी को श्रमण जीवन के लिये प्रेरित करने में महासती धूल कुंवर का विशेष योगदान रहा, जिसे उपाध्यायश्रीजी बहुत ही आदर से स्मरण करते थे। उनके कथा, काव्य व प्रवचन-साहित्य में शीलवती व साहसी नारियों के जीवन की महिमा का बखान किया गया है। जैन कथाओं में प्रायः कोई भी कथा नारी के किसी न किसी प्रेरक आदर्श के बगैर पूरी नहीं होती है। ‘‘जैन धर्म में दान एक अनुशीलन‘‘ पुस्तक में वे चन्दनबाला द्वारा उड़द के बाकुलों से भगवान् महावीर के पारणें का उल्लेख करते हुए नारी के तप-त्याग व भावना को चरमोत्कर्ष प्रदान करते हैं। इसी ग्रन्थ में अनेक उद्धार सन्नारियों के उदाहरण सर्वस्व समर्पण की नई प्रेरणाएं देते हैं।
       ‘‘श्रावक धर्म दर्शन‘‘ पुस्तक में वे महात्मा गांधी के जीवन निर्माण में माँ का योगदान का वर्णन करते हैं कि जब महात्मा गांधी को विदेश जाना था तब उनकी माता उनको जैन मुनि बेचर स्वामी के पास ले गई और मांसाहार, मदिरापान और अनाचार का परित्याग करवाया। एक उदाहरण में अर्जुन रंभा में मातृभाव का दर्शन करता हैं। इससे नारी जाति को मर्यादा की सीख दी गई है। सतीत्व के रक्षार्थ नारियों की दृढता और तेजस्विता की स्थान स्थान पर वे प्रशंसा करते हैं।
        चतुर्थ ब्रह्मचर्य व्रत के माध्यम से नारी को दी गई स्वतंत्रता का उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी म. बहुत सुन्दर विवेचन करते हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘ब्रह्मचर्य विज्ञान‘‘ में पृष्ठ संख्या 483 से 488 तक ‘‘नारी जीवन और ब्रह्मचर्य‘‘ अध्याय में उपाध्यायश्री जी स्पष्टरूप से कहते हैं कि अन्य धर्म दर्शनों की तुलना में जैन धर्म में नारी को उच्चतर स्थान दिया गया है। वे लिखते हैं - ‘‘समय आने पर पुरूषों की अपेक्षा साध्वी स्त्रियाँ अथवा सतियां ब्रह्मचर्य व्रत में अधिक दृढ हो रही हैं।‘‘ उन्होनें उदाहरण देकर बताया कि राजमती ने रथनेमी को संयम में दृढ किया और कोशा श्राविका ने आचार्य स्थूलिभद्र के गुरूभाई को चतुराई से सन्मार्ग दिखाया। लिपि और गणित की विशेषज्ञा ब्राह्मी और सुन्दरी, तीर्थंकर पद पाने वाली मल्ली भगवती और चौदह हजार श्रमणियों की प्रमुखा महासती चन्दनबाला का बडे़ ही गौरव से उल्लेख करते हुए उपाध्यायश्रीजी समस्त महिला वर्ग को उनसे विविध मंगल प्रेरणााएं लेने का आह्वान करते हैं।
        उन्होनें नारी को पुरूष की सहचारिणी कहने के साथ साथ उसे धर्म-सहाया यानि धर्म में सहायता करने वाली बताया है। एक और वह धर्म सहाया है, वहीं दूसरी और उसे धर्म साधना में पूर्ण स्वतंत्रता दी गई है। सातवें अंग आगम उपासकदशा सूत्र के संदर्भ से उपाध्यायश्रीजी लिखते हैं कि श्रावकों से साथ साथ उनकी पत्नियों ने भी भगवान् महावीर से श्रावक के व्रतों को अंगीकार किया। आठवें अंग आगम अंतकृतदशा सूत्र के संदर्भ में वे कहते हैं कि अनेक गृहिणीयों, रानियों, और महारानियों ने श्रमणी जीवन में दीक्षित होकर संसार के समक्ष त्याग का अनुपम आदर्श प्रस्तुत किया।
         उपाध्यायश्री पुष्करमुनि जी चाहते हैं कि नारी जीवन में संयम और सादगी की प्रतिष्ठा हो। ब्रह्मचर्य विज्ञान में वे लिखते हैं। - ‘‘आधुनिक नारी में संयम और दृढता कम है, प्रसाधन सौंदर्यप्रियता और प्रदर्शनप्रियता अधिक है। वह अपने शरीर का इस तरह प्रदर्शन करती या सजती संवरती है कि वह दूसरों के लिये लोभ व ईर्ष्या का कारण बन जाती है।‘‘ नारी जीवन के समग्र उत्कर्ष के लिये वे ब्रह्मचर्य पर जोर देते हुए कहते हैं - जब नारी जीवन में ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा होगी तब उसमें विश्वमातृत्व बनेगा।‘‘ संत विनोबा के बाद उपाध्यायश्रीजी ने ‘‘विश्वमातृत्व‘‘ शब्द का प्रयोग करके नारी के महान् आदर्श को सबके सामने रखा है।
        शास्त्रों में स्थान स्थान पर पुरूषों के लिये तरह तरह के नियमों का विधान किया गया है तो महिलाओं के लिये क्या प्रावधान हैं? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उपाध्यायश्रीजी सुझाव देते हैं। कि जो नियम पुरूषो के लिये हैं, वे ही नियम स्त्रियों के लिये है। जैसे ‘‘स्वदार संतोष‘‘ के स्थान पर ‘‘स्वपति संतोष‘‘ समझना। सभी मामलों में ऐसा ही समझना चाहिए। सामाजिक कर्तव्यों के निर्वहन में हो या आध्यात्मिक साधना में, नारी को सब जगह आगे बढने के समान अवसर प्राप्त है।
          उपाध्यायश्री पुष्करमुनि जी म. के साहित्य में नारी जीवन के सभी आदर्शों की महिमा गाई गई है। वे नारी स्वतंत्रता के पक्ष में तो हैं, लेकिन नारी के स्वच्छन्दाचार के पक्ष में नहीं है। मर्यादाओं का उल्लंघन सिर्फ नारी जीवन के लिये ही अहितकर नहीं है, अपितु वह परिवार और समाज के लिए भी अहितकर है। उपाध्यायश्रीजी के साहित्य का स्वाध्याय करने से नारी के प्रेरक व उज्जवल आदर्श हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं। उपाध्यायश्रीजी के साहित्य में वर्णित नारी जीवन के आदर्शो को अपनाया जाए तो वर्तमान समय की कई समस्याएं नौ दो ग्यारह हो जायेगी। -सीमा दिलीप धींग, प्रैसवार्ता

श्रावक जीवन में ब्रह्मचर्य की मर्यादा:श्री पुष्कर मुनि

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Pushkar Muniजो लोग यह कहते हैं कि गृहस्थजीवन में स्वपत्नी - सन्तोषव्रत की आवश्यकता क्यों है? क्या स्वपत्नी और क्या परपत्नी, अब्रह्मचर्य-सेवन में पाप तो एक सरीखा ही लगता है, तब मर्यादाओं में बँधने से क्या लाभ है?
भारतीय संस्कृति और धर्मों का मत इसके बिलकुल विपरीत है। भारतीय धर्मां का मत है कि गृहस्थ जीवन में जो लोग इतनी मर्यादा का भी पालन नहीं करते, उनके ध्यान में गृहस्थाश्रम का लक्ष्य केवल वासनापूर्ति करना ही नहीं, अपितु ब्रह्मचर्य के आदर्श को प्राप्त करना है। वहाँ पत्नी केवल भोगवासना की पूर्ति की कठपुतली नहीं, अपितु ब्रह्मचर्य मार्ग पर बढ़ने में सहायिका है। शास्त्रों में उसके ‘धम्म सहाया’ धर्मपत्नी, सहचारिणी, पतिव्रता आदि अनेक सुन्दर और सार्थक नामों का उल्लेख किया गया है। इसलिए वहाँ ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने के साथ स्वपत्नी-सन्तोष ही नहीं, अपितु अब्रह्मचर्य सेवन पर अन्य कई अंकुश आ जाते हैं। किन्तु ब्रह्मचर्यव्रत का स्वीकार न करने पर व्यक्ति उच्छृंखल, अमर्यादित और अविश्सनीय हो जाता है। ऐसे उच्छृंखल व्यक्ति कामी कुत्ते बनकर जगह-जगह कामवासना की झूठन के लिए ताकते-फिरते है। उनकी भद्र घरों में बेइज्जती होती है, समाज में ऐसे व्यभिचारियों का अपमान होता है, राष्ट्र व समाज में उनकी कोई प्रतिष्ठा नहीं होती। चाहे उनके पास पर्याप्त धन हो, सत्ता भी मिल गई हो, परन्तु इस लोक में उनका व्यभिचारी जीवन उन्हें बर्बाद कर देता है। लाखों वर्ष बीत जाने पर भी आज तक जो अपमान और घृणा का भाव राक्षस जाति और रावण के नाम पर बरस रहा है, वह केवल इसी दुर्गुण के कारण ही तो है? परस्त्री के अपहरण और स्वपत्नी सन्तोष न होने के कारण रावण को आज तक प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त हो पाई है। संसार का असाधारण वैभव पाकर भी राक्षस-जाति और यादव जाति क्यों बर्बाद हो गई ? लंका और द्वारिका दोनों स्वर्ण की नगरियाँ थी, किन्तु स्वर्ण की चकाचौंध में दोनों अपने जीवन का निर्माण करना भूल गए। एक ओर रावण का विशाल साम्राज्य इसी उच्छृंखल व्यभिचारी वृत्ति के कारण धूल में मिल गया तो दूसरी ओर द्वारिका को यादवों के इसी असंयमी जीवन ने आग में झोंक दिया।
निष्कर्ष यह है कि ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण न करने के कारण व्यभिचार का शिकार बना हुआ व्यक्ति धन और वैभव में कितना ही बढ़ा-चढ़ा हो, नैतिक बल न होने के कारण संसार में उसे प्रतिष्ठा ओर सुख-शान्ति प्राप्त नहीं होती। इसलिए गृहस्थ जीवन में इस चतुर्थ अणुव्रत का ग्रहण करना बहुत ही आवश्यक है। इस व्रत को ग्रहण करने वाला गृहस्थ अपनी एक पाणिगृहीत पत्नी के सिवाय संसारभर की नारियों को माता व बहिन समझता है, वह उन्हें पवित्र मातृ भावना से देखता है।
बुन्देलखण्ड के राजा छत्रसाल की परस्त्री के प्रति पवित्र  दृष्टि थी। वे प्रजावत्सल एंव धर्मनिष्ठ शासक थे। वे प्रतिदिन सन्ध्यासमय प्रजा के सुख-दुःख का पता लगाने के लिए नगर में भ्रमण करने निकलते थे। एक धनिक विधवा स्त्री उनका रुप देखकर मोहित हो गई। उसने अपनी नौकरानी को भेज कर राजा छत्रसाल से कहलाया कि वह बहुत दुःखी है, ओर आपसे अपना दुःख कहना चाहती है। प्रजावत्सल राजा यह सुनकर शीघ्र ही उसके घर में पहुँच गए। महिला ने उन्हं अत्यन्त आदरपूर्वक एक सुसज्जित कमरे में उच्च आसन पर बिठाया। महिला से उसके दुःख का कारण पूछे जाने पर उसनें कहा-मैं बहुत दुःखी हूँ मेरे पति गुजर चुके हैं, कोई पुत्र नहीं है, मैं आप जैसा सुन्दर पुत्र चाहती हूँ। कृपया आप मुझे स्वीकार करें, मैं अपना हृदय आपको समर्पित करती हूँ।’’
राजा छत्रसाल कुछ देर विचार करके कहा- ‘‘पुत्र होगा तो पता नहीं मेरे जैसा सुन्दर होगा या नहीं ? तुम मुझे ही अपना पुत्र समझ लो। तुम मेरी माता और मैं तुम्हारा पुत्र! स्वीकार कर लो !’’
महिला यह सुनते ही अत्यन्त लज्जित हो गई, उसका कामविकार वात्सल्य - भाव के रुप में परिणत हो गया। राजा छत्रसाल उसी दिन से उसे अपनी माता मानने लगे और प्रतिवर्ष कुछ न कुछ भेंट उसे दिया करते थे। जब तक वह जीवित रही, उस माता के भरणपोषण का ध्यान रखते थे।
यह है गृहस्थ जीवन में मर्यादित ब्रह्मचर्य का ज्वलन्त उदाहरण ! राजर्षि नमि ने एक बार अपनी सेना को इस सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण नैतिकबल का सन्देश दिया था-‘‘जब तुम दूसरे देश के विजेता बन जाओगे, तब तुम्हारे सामने वहाँ की प्रजा का वैभव और भोग विलास की सामग्री होगी, सैनिक के हाथ में शक्ति रहती है और वह उसके मद में पागल हो जाता है। परन्तु तुम्हारे अन्दर इतना चरित्रबल होना चाहिए कि तुम वहाँ की जनता की एक भी वस्तु को न छुओ। उस देश की सुन्दरी महिलाएँ तुम्हारी माताएँ और बहनें होनी चाहिए।’’
जिन सैनिकों में नैतिक बल होता है, वे किसी देश को जीतने पर भी न तो धन लूटने का प्रयास करते हैं, और न वहाँ की महिलाओं की इज्जत लूटने का प्रयास करते हैं। जनता के हृदय में ऐसे सैनिकों के उच्च चरित्र की छाप अंकित हो जाती है।
ऐसे सैनिकों के जीवन जैसा ही गृहस्थ का जीवन होना चाहिए। गृहस्थ में यदि चरित्रबल है तो वह जिस घर में रहता है, वहाँ भी प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और जहाँ भी वह नाते-रिश्तेदारों में जाता है, तब भी आदर पाता है। जिसमें चरित्र बल है, उसके लिए ‘मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्’ अप्सरा-सी सुन्दरियाँ (पर-स्त्रियाँ) माताएँ, बहनें हैं, परद्रव्य चाहंे लाखों का ढेर हो, उसके लिए ढेले के समान है।
एक व्यापारी या दूकानदार किसी भी देश या प्रान्त में रहे, कोई भी सात्त्विक व्यवसाय या व्यापार-धन्धा करे, मगर उसमें इतना चरित्रबल होना चाहिए कि कोई भी महिला उसके सम्पर्क में आए, कुछ भी सौदा ले, देखे, किन्तु उसकी दृष्टि में उसके प्रति मातृभाव या भगिनी भाव होना चाहिए। अगर उसकी दृष्टि में सात्त्विकता होगी तो संसार में उसके लिए किसी वस्तु की कमी न रहेगी, उसका जीवन सबके लिए विश्वसनीय, स्पृहणीय और आदरणीय बन जाएगा। उसके सदाचार का प्रभाव अमिट होगा।
परस्त्री के प्रति ऐसी मातृभावना या भगिनी भावना से उक्त गृहस्थ का जीवन आदरणीय एवं विश्वसनीय तो बनता ही है, साथ उसके अपने हृदय में भी विकारभाव नहीं आता। उसका दाम्पत्य-जीवन भी सुखी और शान्तिमय बनता है। वह एक सुन्दर परम्परा भी अपने परिवार में छोड़ जाता है। कहा है जो चोंच देता है वो चुग्गा भी देता है।
एक लखारा था। वह अपनी गधी पर बैठकर आसपास के गाँवों में चूड़ियाँ बेचने जाया करता था। एक दिन वह गधी पर बैठ कर कहीं जा रहा था। गधी धीरे - धीरे चलने लगी। तब लखारा उसे हाँकते हुए कहता जाता था- बेटी चल ! बहन चल, चल माँ ! लखारे के इस सम्बोधन को सुनकर कुछ राहगीर उससे कहने लगे- ‘‘तू भी कैसा मूर्ख है, इस गधी को माँ, बहन, बेटी कहता है। क्या वह गधी तेरी माँ, बहन या बेटी हो सकती है ?’’ लखारे ने यह सुना तो बोला- ‘आपका कहना ठीक है। यह गधी होने के कारण  मेरी माँ, बहन या बेटी नहीं हो सकती है। लेकिन स्त्री जाति के प्रति माँ, बहन या बेटी की भावना जगाने वाली तो हो सकती है न ? अगर मैं इस गधी को माता, भगिनी और पुत्री की भावना से नहीं देखूँगा, तो महिलाओं के प्रति ऐसी भावना कैसे रख सकूँगा ? मैं लखारा हूँ। महिलाओं को चूड़ियाँ पहनाता हूँ। बड़े-बड़े घरों में मेरा आना-जाना रहता है। प्रतिदिन सुन्दर-सुन्दर नारियों के कोमल-कोमल हाथ चूड़ियाँ पहनाने के लिए मेरे हाथों में आया करते हैं। यदि मैं उनके प्रति माता, भगिनी और पुत्री भाव न रखूं-किसी प्रकार की कुभावना रखूँ, तो मैं लोगों में अपना विश्वास भी खो दूँ तथा व्यवसाय से भी हाथ धो बैठूँ। इसलिए मैं इस गधी को भी माँ, बहन और बेटी के समान मानता हूँ; ताकि मैं अन्य महिलाओं को भी मां, बहन और बेटी के समान मान सकूँ।
लखारे की बात सुनकर सबने उसकी भावना की हार्दिक प्रशंसा की। तात्पर्य यह है-गृहस्थ चाहे जिस व्यवसाय को करता हो, अपने सम्पर्क में आने वाली प्रत्येक बहन को माता, भगिनी या पुत्री की दृष्टि से देखे तो उसका ब्रह्मचर्यव्रत भी सुरक्षित रह सकता है, विश्वस्त भी।
यूरोप में जहाँ चारों ओर भोगविलास का वातावरण है, वहाँ विश्व के प्रसिद्ध साहित्यकार ‘जार्ज बनार्डशा’ उससे निर्लिप्त रहे। उन्होंने अपने जीवन में कामवासना के गलत रूप को कभी स्थान नहीं दिया। उनके हृदय में संसारभर की स्त्रियों के लिए पवित्रभाव का झरना ही बहता रहा। इतना ऊँचा चरित्रबल रखा, तभी तो वे 94 वर्ष की आयु तक संसार को उत्तम, संयमपूर्ण विचार देते रहे। उनके स्वस्थ एवं स्वच्छ चिन्तन की धारा अन्तिम समय तक बहती रही।
इसी प्रकार डॉक्टर, वैद्य, चिकित्सक में भी इतना चरित्रबल होना चाहिए कि जो भी महिला उसके पास इलाज के लिए आए उसके प्रति माँ, बहन या बेटी की पवित्र दृष्टि रखे।
लेकिन आज भारत के गृहस्थों की भावना और दृष्टि ही पश्चिम के अत्यधिक सम्पर्क से प्रायः बदल गई हैं। डाक्टर, अध्यापक या अन्य बड़े-बड़े अधिकारीगणों का यह हाल है कि वे अपनी स्त्री होते हुए भी इधर-उधर ताक-झांक करते रहते हैं। किसी न किसी भोलीभाली महिला को चंगुल में फँसा लेते हैं, जब भण्डाफोड़ होता है तो वहाँ से अन्यत्र खिसक जाते हैं। दूसरे शहर में जाकर अपना डेरा जमाते हैं। परन्तु ऐसे लोगों का जीवन भी प्रायः अशान्त, भयभ्रान्त, और अप्रतिष्ठित बना रहता है।
श्रावक के ब्रह्मचर्य व्रत की मर्यादा
इन सब दृष्टियों से गृहस्थ जीवन में भी मनुष्य ब्रह्मचर्य से रह सकता है। यद्यपि पूर्ण ब्रह्मचारी और गृहस्थ ब्रह्मचारी में बहुत अनतर होता है। तथापि यदि गृहस्थाश्रम में भी संयम, नियम से चले तो वह भी वासना के जहर को बहुत अंशों में कम कर देता है। यद्यपि पूर्ण ब्रह्मचर्य में मैथुनांगो सहित सभी प्रकार के मैथुनों का मन वचन काया से करने कराने और अनुमोदन करने का त्याग किया जाता है, इस अपेक्षा से आंशिक ब्रह्मचर्य (देशविरति ब्रह्मचर्य) बात का आदर्श काफी नीचा है, तथापि देशविरति, ब्रह्मचर्य धारक भी बहुत अंशों में अब्रह्मचर्य का त्याग कर देता है, प्रत्येक विवाहित स्त्री-पुरूष इस देशविरति ब्रह्मचर्य व्रत का भली-भांति पालन भी कर सकते हैं। देशविरति ब्रह्मचर्य का स्वीकार करने से विवाहित स्त्री-पुरूष के सांसारिक कार्यों में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती। इसलिए देशविरति ब्रह्मचर्य का पालन करना नैतिक, धार्मिक सभी दृष्टियों से प्रत्येक गृहस्थ के लिए उचित है। देशविरति ब्रह्मचर्यव्रत को अंगीकार करने वाला सद्गृहस्थ इस प्रकार प्रतिज्ञा लेता है-
‘‘संसार संतोसिए अवसेसं मेहुणं पच्चक्खामि जाव जीवाए (देवदेवी सम्बन्धी) दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा (मनुष्य मनुष्यणी तथा तिर्यन्च तिर्यंचणी सम्बन्धी) एगविहं एगविहेणं न करेमि कायसा।’’ -‘‘मैं (देशविरति ब्रह्मचर्य व्रत में) स्वदार-सन्तोष के अतिरिक्त शेष समस्त (स्त्रीजाति के प्रति) मैथुन का प्रत्याख्यान (त्याग) करता हूँ, यावज्जीव तक, देव देवी सम्बन्धी मैथुन का दो करण -तीन योग से (यानि मैथुनसेवन न करूँगा, न कराऊँगा, मन से, वचन से और काया से) इसी प्रकार मनुष्य-मनुष्यणी सम्बन्धी, तथा तिर्यंच-तिर्यंची सम्बन्धि मैथुन सेवन का एक करण, एक योग से (अर्थात् काया से)  त्याग करता हूँ।’’(प्रैसवार्ता)

तीर्थंकरों के सात महाकाव्य

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Dr.mahendra Bhanawat.1श्री मनोहरलाल कांठेड ऐसे प्रथम और एकमार्त महाकाव्यकार हैं जिन्होंने तीर्थंकरों से संबंधित सात महाकाव्यों की रचना कर अपनी गूढ काव्यशक्ति का परिचय दिया। ये महाकाव्य प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से लेकर शांतिनाथ, पाश्र्वनाथ, अरिष्टनेमि, सुव्रत स्वामी, अष्टादश तीर्थंकर चरिर्त और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी से संबंधित हैं।
जैन परम्परा एवं मान्यता का उदात्त ढंग से निर्वाह करते हुए कविवर कांठेडजी ने इन महाकाव्यों में तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा धर्म-दर्शन विषयक परिस्थितियों का बडे ही सरस, सरल एवं रोचक ढंग से वर्णन किया है। इन महाकाव्यों की यह विशेषता है कि ये मालवी में लिखे गये हैं जिसकी हजार वर्षों की उत्कृष्ट सृजन परम्परा है। इस दृष्टि से कांठेडजी ने मालवी भाषा में रचना कर न केवल अपनी मतृभाषा को आलोकित किया बल्कि एक साथ सभी तीर्थंकरों के जीवनादर्शों पर लिख कर प्रथम महाकाव्यकार होने का ऐतिहासिक गौरव अर्जित किया साथ ही अपनी मातृभाषा का ऋण भी उतारा है। शास्र्तों में उल्लिखित घटना-प्रसंगों तथा जन-मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए कवि ने मालवी लोकसंस्कृति की जीवनधर्मिता तथा स्थानीयता के महत्व को दिग्दर्शित करने की भरपूर कोशिश की है। उदाहरण के लिए भगावान ऋषभदेव के नखशिख वर्णन में उनके सिर, आंख, नाक, होठ तथा बालों की उपमा का यह अंदाज दृष्टव्य है जिसमें कहा गया है-
माथो जाणे पहाड की चोटी के आकार हरिको लागे है।
आंखा प्रभु री जाणे कमल रो सफेद फूल लागे है।।   
प्रभु ऋषभ रो नाक गरूड चोंच हरिको लागे है।
होठ गणा नज लागे एकदम लालचट है।।
माथा रो एक-एक बाल सेमल रुई सो है।
भगवान ऋषभदेव का सिर पहाड की चोटी, आंखें सफेद कमल का फूल, नाक गरूड की चोंच, होठ एकदम लालिमा लिए और सिर का एक-एक बाल सेमल रुई की तरह है। इस तरह की उपमाएं कवि की नवीन दृष्टि की सूचक हैं जिनमें स्थानीय मालवी संस्कृति के रंगबोध की छाप दर्शित होती है। यही कारण है कि कवि की वर्णनशैली में मालवी का माधुर्य, उसकी गतिशीलता का प्रवाह तथा लोकाचारों एवं लोकविश्वासों का अपनापा सहज प्रस्फुटित हुआ मिलता है।
हाल ही में आयोजित उज्जैन में मालव लोकसंस्कृति प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित कांठेडजी के सम्मान समारोह में मुझे भी आमंर्तित किया गया तब कांठेडजी से मिलकर मुझे अति प्रसन्नता हुई और यह लगा कि पिचहतर वर्ष की उम्र में भी कांठेडजी अपनी काव्य साधना में अंत:पैठ लिए हैं। इस अवसर पर आसपास के कस्बों और गांवों के जैन जगत के वरिष्ठ श्रावक भी उपस्थित थे जिन्होंने कांठेडजी का अपने संघ की ओर से भावभीना अभिनंदन किया। समारोह में विक्रम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा के संपादन में प्रकाशित 'मालव मनोहरञ नामक पुस्तिका का लोकार्पण वहां के पुलिस महानिरीक्षक, श्रेष्ठ कवि एवं प्रबुद्ध विचारक पवन जैन ने किया। पुस्तिका में रचनाकार के संबंध में विद्वानों ने बडे ही महत्वपूर्ण एवं मूल्यांकनपरक अपने मत-सम्मत प्रकट किये हैं।
कांठेडजी जैनधर्म, दर्शन एवं संस्कृति के ज्ञाता, सुधर्मी विद्वान ही नहीं, अपने जीवन में भी पूर्णरूपेण साधुमना संस्कारी हैं। उनके द्वारा रचित महाकाव्यों में लोकचित्त का जो रचाव और जीवनदर्शन है वह गेयता की दृष्टि से अधिक माधुर्य लिए है। ऐसा लेखन बौद्धिक चेतना से अधिक लोकचित्त की आराधना का ही आनंद होता है। कांठेडजी लिखित प्रत्येक महाकाव्य अपने कलेवर में 2400 छंद की विपुल संख्या लिए है किन्तु इनमें से कोई महाकाव्य प्रकाशित नहीं है। जैन समाज के लिए ये महाकाव्य अप्रतिम धरोहर हैं किन्तु इनका प्रकाशित नहीं होना विडम्बना ही है। समाज को चाहिये कि जीवनभर अपनी साधना से उत्कृष्ट कृतियों का सृजन करने वाले कांठेडजी की कृतियां उनके जीवनकाल में प्रकाशित कर उनका उचित अभिनंदन करे ताकि नई पीढी को भी प्रेरणा मिल सके। -लोककलाविद् डॉ. महेन्द्र भानावत, प्रैसवार्ता

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